अज्ञान रूपी पालने में
ज्ञान रूपी शिशु सुलाकर
सकल वेदशास्त्र रूपी रस्सी से बाँधकर झूला,
झुलाती हुई पालने
लोरी गा रही है, भ्रान्ति रूपी माई!
जब तक पालना न टूटे, रस्सी न कटे
लोरी बन्द न हो
तब तक गुहेश्वर लिंग के दर्शन नहीं होंगे॥
अल्लम सृजनशीलता के प्रति विश्वास रखते हैं कि ‘नि:शब्द ज्ञान क्या शब्दों की साधना से सम्भव है?’
बहती नदी को देह भर पाँव
जलती आग को देह भर जिह्वा
बहती हवा को देह भर हाथ
अतः गुहेश्वर, तेरे शरण का सर्वांग लिंगमय है॥

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