‘अलविदा नेहरू’ में उन शोकाकुल नज़्मों को संकलित किया गया है जो उर्दू शायरों ने नेहरू को श्रद्धांजलि देते हुए कहीं। इन शायरों में उस दौर के लगभग तमाम शायर शामिल हैं। इस मर्सियानुमा शायरी को पढ़ते हुए एहसास होता है कि राजनेता और व्यक्ति के रूप में नेहरू को कितनी व्यापक और दिली स्वीकृति हासिल थी।
पुस्तक की भूमिका में महमूद फ़ारूक़ी लिखते हैं कि “तरक़्क़ीपसन्द शायर कई मामलों में ख़ुद को नेहरू के क़रीबतर पाते थे। बेशतर नौजवान उर्दू शायर वैसी ही आज़ादी चाहते थे जो नेहरू का ख़्वाब थी जिसमें शान्ति, तरक़्क़ी, आर्थिक ख़ुशहाली, इनसान और फ़र्द की आज़ादी शामिल रहे...और रैशनलिज़्म को फ़रोग़ दिया जाए।”
नेहरू का जाना उनके लिए उस पूरी तहरीक का माँद पड़ जाना था, जो इस मुल्क को एक समतावादी, सेक्युलर और आधुनिक देश बनाने के लिए उनके नेतृत्व में शुरू हुई थी।
आज जब नेहरू के राजनीतिक मूल्यों और उनके दौर की आर्थिक-सामाजिक उपलब्धियों पर तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं, ये रचनाएँ उनकी छवि का एक अलग रुख़ पेश करती हैं।

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