अपने समय में बेहद चर्चित और विवादास्पद इस उपन्यास के केन्द्र में दाम्पत्य और स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की जटिलताएँ और पिछली सदी के सातवें-आठवे दशक में हिन्दी का साहित्यिक परिदृश्य है।
नरेन्द्र और शकुन्तला—जो निजी तौर पर अपने दाम्पत्य के उस दौर में हैं जब पति-पत्नी एक-दूसरे की तमाम खामियों-खूबियों को जानकर जीवन को नए ढंग से देखना-समझना और अपनी परिस्थितियों से सामंजस्य बनाना सीख रहे होते हैं—एक प्रकाशन-संस्थान चलाते हैं। साहित्यिक रूप से सम्पन्न एक शहर के परिप्रेक्ष्य में यह उपन्यास लेखकीय जीवन की महत्त्वाकांक्षाओं, एक मध्यवर्गीय व्यक्ति की नैतिक कमजोरियों के साथ-साथ उस समय को भी सूक्ष्मता से अंकित करता चलता है जिसे हिन्दी रचनात्मकता के अत्यन्त सक्रिय दौर के रूप में आज भी याद किया जाता है।
तीव्र आवेग से युक्त यह उपन्यास जितना पठनीय है अपनी भाषा-सामर्थ्य के चलते उतना ही रोचक भी है। आधी सदी पहले लिखे गए इस उपन्यास की शब्द-सम्पदा आज के पाठकों और लेखकों को भी, चकित कर सकती है।
‘सती मैया का चौरा’, ‘एक जीनियस की प्रेमकथा’ और ‘भाग्य-देवता’ जैसे उपन्यासों और कई उल्लेखनीय कहानी-संग्रहों के रचियता कथाकार भैरव प्रसाद गुप्त के इस उपन्यास की यह प्रस्तुति निश्चय ही पाठकों को आकिर्षत करेगी।


