भगवतीचरण वर्मा के उपन्यासों में सिर्फ़ कहानी नहीं होती, उसके साथ व्यंग्य, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, दर्शन व इतिहास की गहरी समझ भी होती है।
काव्यात्मकता उनकी भाषा का वह तत्व है जो पाठक को लगातार उपन्यास में डुबोए रखता है। इस उपन्यास में उन्होंने दिल्ली की पृष्ठभूमि में रहन-सहन के नए तौर-तरीकों पर व्यंग्य-प्रहार करते हुए अधकचरी आधुनिकता की आलोचना की है।
विभिन्न मनास्थितियों और सामाजिक-राजनीतिक-ऐतिहासिक परिस्थितियों को उपन्यास की संरचना में कुशलतापूर्वक विन्यस्त करने वाले भगवतीचरण वर्मा का यह उपन्यास अपने अलग आस्वाद के लिए हमेशा सराहा जाता रहा है।


