‘बँसवा फूले उजियार’ एक सपने की जिन्दा तफसील है। यहाँ आपको स्त्री सशक्तता की जमीनी हकीकत मिलेगी, जिसमें गाँव और कस्बाई समाज की स्त्री अवहेलना और दमन की कहानियाँ हैं। उपन्यास में मौजूद स्त्रियों की चेतना संघर्ष की राह चल हाशिए के समाज का दम-खम बनकर निखर गई है। सामाजिक बेहतरी के राजनीतिक आर्थिक फार्मूलों में छिपी सत्ताओं की नीयत के मुकाबले खड़ी हुई स्त्रियों में तारा है, ज्योति है, एक कामयाब झलक में राजकुमारी भी है। इन स्त्रियों के साहस का पक्ष बनकर खड़ा होने वाला समाज बेशक नहीं है, क्योंकि कोई भी दुनिया सहसा नहीं बदलती मगर धीरे-धीरे ही सही अपने नाभिक में वह परिवर्तन की आग जलाए रखती है। लेखिका ने बाँसफोड़ जैसी तिरस्कृत जाति के हुनर से जुड़कर एक सर्वव्यापी रूपान्तरण की हाइपोथीसिस को बड़े एहतियात से प्रस्तुत किया है। कथा में बदले हुए पुरुष भी हैं, इसलिए मुक्ति कभी अकेले में नहीं मिलती जैसे मुक्तिबोधीय निष्कर्ष की भी दखल यहाँ है और है अछूती प्रकृति की सुन्दरता का विस्तार जिससे जुड़कर फूले हुए बाँस नई और आज़ाद दुनिया का रूपक बन जाते हैं।
इस कथा के मार्मिक पहलू असरदार हैं। जीवन्त सुखान्त की कथा है यह।
—चन्द्रकला त्रिपाठी

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