मजदूरों का विस्थापन न तो अकेले भारत में हो रहा है, न आज पहली बार। सभ्यता के प्रारम्भ से ही कामगारों-व्यापारियों का आवागमन चलता रहा है, लेकिन आज भूमंडलीकरण के दौर में भारत में मजदूरों को प्रवासी बनानेवाली स्थितियाँ और वजहें बिलकुल अलग क़िस्म की हैं। उनका स्वरूप इस क़दर अलग है कि उनसे एक नए घटनाक्रम का आभास होता है। ज्ञात इतिहास में शायद ही कभी, लाखों नहीं, करोड़ों की संख्या में मजदूर अपना घर-बार छोड़कर कमाने, पेट पालने और अपने आश्रितों के भरण-पोषण के लिए बाहर निकल पड़े हों।
देश के सबसे पिछड़े राज्य बिहार और सबसे विकसित राज्य पंजाब के बीच मज़दूरों की आवाजाही आज सबसे अधिक ध्यान खींच रही है। यह संख्या लाखों में है। पंजाब की अर्थव्यवस्था, वहाँ के शहरी-ग्रामीण जीवन में बिहार के 'भैया' मजदूर अनिवार्य अंग बन गए हैं और बिहार के सबसे पिछड़े इलाकों के जीवन और नए विकास की सुगबुगाहट में पंजाब की कमाई एक आधार बनती जा रही है। यह पुस्तक इसी प्रवृत्ति, इसी बदलाव, इसी प्रभाव के अध्ययन की एक कोशिश है। इस कोशिश में लेखक के साल-भर गहन अध्ययन, लम्बी यात्राओं और मजदूरों के साथ बिताए समय से पुस्तक आधिकारिक दस्तावेज़ और किसी रोचक कथा जैसी बन पड़ी है।
पंजाब और बिहार के बीच शटल की तरह डोलते मजदूरों की जीवन-शैली की टोह लेती यह कथा कभी पंजाब का नज़ारा पेश करती है तो कभी बिहार के धुर पिछड़े गाँवों का। शैली इतनी रोचक और मार्मिक है कि लाखों प्रवासी मजदूरों और पंजाब पर उनके असर के तमाम विवरणों का बखान करती यह पुस्तक कब खत्म हो जाती है, पता ही नहीं चलता।

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