जंगल-जंगल घूमकर वैदिक ऋचाएँ रचनेवाली ब्रह्मवादिनियों, बुद्ध से प्रत्यक्ष संवाद करनेवाली थेरियों और ज्ञानिनामअग्रगण्य उद्धव से हँसमुख विवाद में उन्हें एकदम अवाक् छोड़ जानेवाली (भ्रमरगीत की) गोपियों के समकक्ष ‘बिस्कोहर की वसंतसेनाएँ’ की सामूहिक इयत्ता रेखांकित करनेवाली यह कविता-शृंखला स्त्री-विमर्श के गर्भ से जन्मे एक नवल पुरुष का सार्थक हस्तक्षेप है। टेलिस्कोपन तकनीक से इन मज़दूर/मजबूर यौनकर्मियों का जीवन पहले तो ज़ूम आउट करके दूर से दिखाया जाता है, फिर धीरे-धीरे फोकल शिफ्ट के सहारे एक-एक के जीवन की विडम्बनाएँ अन्तरंग विवरणों के साथ ऐसे उजागर की जाती हैं जैसे दोस्तोवस्की की ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ में सोनिया के जीवन की।
अनामिका
कुमार अनुपम की यह कविता पुस्तक उन स्त्रियों की गाथा है जिन्हें ‘सब्बेसं हेतु’ माना गया; यह ‘स्त्री होने के दुख’ का महाकाव्य है; ‘नृशंस अतृप्ति’ की घोर भर्त्सना है और ‘चींटी के ख़्वाब की मानिन्द’ सबसे पवित्र स्वप्न, मुक्तिस्वप्न, का साकार रूप है। ‘बिस-को-हर’ की प्रार्थना को अभिहित करता ग्राम बिस्कोहर अद्भुत कथाओं और दन्तकथाओं का क्षेत्र है। अनुपम ने तरल भावों को अपनी विचार शक्ति और शोध से सुदृढ़ किया है। अनुपम ने समतुल्य लय-गति से समय की गति को पकड़ा है। बेहद सादे, सरल पदों और वाक्यों में; लेकिन ‘बहुत सरल लगने वाले वाक्य अक्सर सरल नहीं होते’। यह एक संश्लिष्ट और अनेक स्तरों वाली संरचना है, कथा और गीत को सम्मिश्रित करती, और लोककथा से लेकर विष्णु पुराण तथा थेरी गाथा और अम्बपाली तक के विपुल प्रसार को आयत्त करती—कल्पना की उत्ताल पेंगों तक पाठक को ले जाती। अपने अन्तिम प्रभाव में अत्यन्त कारुणिक यह कृति समकालीन भारतीय काव्य का अप्रतिम प्ररोह है।
अरुण कमल

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