ज्योति चावला की कहानियों के विषय का रेंज इतना अधिक है कि एक तरफ विभाजन और 1984 के दंगों का दंश झेल चुके समुदाय हैं तो दूसरी तरफ बिहार के ग्रामीण परिवेश में यातना झेल रही स्त्रियाँ। एक तीसरा पक्ष महानगरीय जीवन भी है, वह जीवन जहाँ अकेलापन और अजनबीयत मनुष्य के जीवन का स्थायी त्रास बन चुका है। इस संग्रह में ‘चाबी, घर और अँधेरा’ और ‘लाजो’ कहानियाँ सिख समुदाय के दर्द को बयाँ करती हैं। दंगों का दंश कभी खत्म नहीं होता है। वह अलग-अलग रूपों में बार-बार जीवन पर आक्रमण करता है। ‘लाजो’ इस बात का प्रमाण है कि दंगों का दंश सबसे अधिक स्त्री झेलती है।
ज्योति की कहानियों में स्त्री पात्रों के अलग-अलग शेड्स हैं। वे अपनी निर्मिति में लेखक का साथ पाकर जीवन्त हो उठती हैं। यहाँ विषय को चुनने की एक बारीक निगाह और समझ है। यहाँ एक सुखी-सम्पन्न परिवार में भी एक स्त्री के दुख को परखा गया है। यहाँ अपने समय की धड़कन भी है और अपने समय का संघर्ष भी। ये कहानियाँ अपनी भाषा-शैली में कवितापन लिये हुए हैं। ‘सप्तपर्णी’ तथा ‘यह धुँआ-सा कहाँ से उठता है’ जैसी कहानियाँ जहाँ एक ओर शहरी और पारिवारिक अजनबीपन व अकेलेपन की उपज हैं वहीं शिल्प की दृष्टि से दोनों ही कहानियाँ बेहद काव्यात्मक हैं। भाषा में बसी लय के साथ ये कहानियाँ अपनी कथावस्तु में और मार्मिक हो जाती हैं। कुल मिलाकर ये कहानियाँ और इन कहानियों के पात्र अपनी व्यथा में पाठक को साथ लिये चलती हैं।

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