दालचीनी प्रेम के बारे में एक अलग तरह का उपन्यास है जिसमें दो कहानियाँ एक-दूसरे के साथ-साथ, एक-दूसरे को सहारा देते हुए चलती हैं।
एक कहानी है मुम्बई में फ़िल्म लेखन के क्षेत्र में संघर्षरत अदीब की, और दूसरी कहानी है उस पांडुलिपि की जो उसे एक कबाड़ी की दुकान में पड़ी मिल जाती है। इस पांडुलिपि में भी प्रेम का ही आख्यान है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि वह युग है जब राजे-महाराजों के दरबार कलाओं को संरक्षण दिया करते थे।
क्या हर युग में प्रेम और प्रेम करने वाले एक ही जैसे होते हैं, क्या प्रेम तत्वत: एक काल-निरपेक्ष सत्य है, जो तब भी रहता है जब ऊपरी तौर ख़त्म होता दिखता है? ऐसे प्रश्नों पर मंथन करते हुए और दो युगों को प्रेम की कसौटी पर कसते हुए, दो भिन्न समयों के प्रेम को समझने की कोशिश करते हुए यह उपन्यास उन सवालों को भी छूता चलता है जो दो व्यक्तियों की सोच के द्वंद्व से उभरते हैं।
लेकिन कई कथा-उपकथाओं में विचरण करता यह उपन्यास यहीं तक सीमित नहीं रहता, सतलुज से जुड़ी अनेक स्मृतियों, पटियाला घराने की शास्त्रीय गायकी और बुज़ुर्गों की आती-जाती बातों-यादों से रचा-बसा यह पाठ एक गझिन पठनीय अनुभव की रचना करता है।

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