धुनों की यात्रा हिन्दी फ़िल्म-संगीतकारों पर केन्द्रित ऐसी पहली मुकम्मल और प्रामाणिक पुस्तक है, जिसमें संगीतकारों के विवरण और उनकी संगीत-रचनाओं के विश्लेषण के साथ उनकी सृजनात्मकता को भारतीय समाज और जनाकांक्षाओं की प्रवृत्तियों के सन्दर्भ में रेखांकित किया गया है।
धुनों की इस यात्रा में मात्र संगीत की सांख्यिकी को ही नहीं देखा गया है, बल्कि संगीत-रचनाओं की जैविक और भौतिक अनुभूतियों को राग, ताल, प्रभाव, सांगीतिक बारीकी और सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिवेश के सन्दर्भ में विवेचित भी किया गया है। समाज के पुराने एवं नए, ढहते और बनते रूपाकारों, मूल्य-संरचनाओं, उल्लास, आवेश-आवेग, संघर्षों और संयोजनों की अक्कासी फिल्मी गीतों में कैसे होती है, यह भी इस सूक्ष्म विवेचना का हिस्सा है।
फिल्म संगीत के बारे में आम धारणा और प्रारम्भिक आकर्षण रोमान का ही होता है। ‘धुनों की यात्रा’ इस मिथकीय भ्रम को तोड़ती है। स्वातंत्र्य चेतना के प्रादुर्भाव, स्वतंत्रता आन्दोलन, रूढ़ सामाजिक विसंगतियों के प्रति अलगाव, बहुलता और बहुमत के प्रति लगाव, जनाकांक्षा की तीव्र अभिव्यक्ति, धर्म और बाज़ार के पाखंड, युवा और युवतर चेतना की सशक्त वैश्विक दृष्टि, उनकी शैलियों और उनके समय की पड़ताल के सन्दर्भ में यह पुस्तक फिल्म-संगीत पर सर्वथा नए दृष्टि-पथ का निर्माण करती है।
संगीत के सन्दर्भों के साथ बदलती प्रवृत्तियों की यह यात्रा आम पाठकों और संगीत रसिकों के लिए तो उपयोगी है ही; भारतीय फ़िल्म संगीत के इतिहास, सांगीतिक धुनों की छवि और छाप, शैलियों की विविधता, विशिष्टता, राग और तालों के विवरण-विस्तार और फ़िल्म संगीत के क्रमिक विकास के सन्दर्भों के चलते एक सन्दर्भ-पुस्तक के रूप में यह अध्येताओं-शोधकर्ताओं के लिए भी उपयोगी होगी।
‘धुनों की यात्रा’ के इस पहले भाग में पिछली सदी के तीस और चालीस के दशक के लगभग सभी संगीतकार शामिल हैं, न सिर्फ वे जिन्हें हम सभी जानते हैं, बल्कि वे भी जिनके नामों से ज्यादातर लोग अनजान हैं।

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