कतिपय कारणों से पिछले कुछ समय से गोरखनाथ की चर्चा एक फ़ैशन जैसी चीज़ हो गई है, जिसके चलते उनकी वाणी का वास्तविक सार कहीं पीछे चला गया है। ऐसी स्थिति में उनकी रचनाओं का यह कवितान्तरण पुनः गोरख-तत्त्व के अन्वेषण की दिशा में एक प्रस्थान-बिन्दु है।
हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर बोधिसत्व ने इस पुस्तक में गुरु गोरखनाथ की एक सौ एक ऐसी सबदियों का कवितान्तरण किया है जो उनकी वाणी के अभिप्रायों को केन्द्रीभूत रूप में प्रस्तुत करती हैं। यह चयन न केवल काव्यान्तरण की दृष्टि से सम्भावनाशील है, बल्कि कहीं न कहीं आज हमारे सामने मौजूद प्रश्नों को भी सम्बोधित करता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि यह काव्यान्तरण केवल मूल रचना के अर्थ को नहीं बताता, उसे विस्तार देता है। गोरखवाणी में प्रयुक्त ऐसे पारिभाषिक शब्दों को, जो विस्तृत व्याख्या की अपेक्षा रखते हैं, यहाँ उन्हें यथेष्ट विस्तार दिया गया है जिससे वे न केवल सम्प्रेषणीय, बल्कि अधिक समीचीन भी हो जाते हैं।
इस काव्यान्तरण में गोरखवाणी की सूक्तिमयता का निर्वहन करते हुए बोधिसत्व अपनी काव्यात्मक व्याख्या में कुछ नई सूक्तियाँ भी रचते हैं जिससे यह पाठ और समृद्ध हो जाता है। लगभग हज़ार वर्षों के अन्तराल के चलते आज के पाठक और गोरखवाणी के बीच जो दूरी पैदा हुई है, यह प्रस्तुति उसे कम करेगी।

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