बहुत से लोग हैं जो अपने आपको लफ़्ज़ देने के लिए शा'इरी इख़्तियार करते हैं मगर कुछ ख़ुशक़िस्मत ऐसे भी हैं जिन्हें ख़ुद शा'इरी अपने आपको ज़ाहिर करने के लिए चुनती है। अभिषेक इन्हीं चन्द ख़ुशक़िस्मतों में शामिल हैं जिन्हें शा'इरी ने इस ज़माने में अपना तर्जुमान मुक़र्रर किया है। ख़ामोशी अभिषेक की शा'इरी की जन्मभूमि है। उसके पास से ख़ामोशी की ख़ुशबू और आँच आती है कि उसके अन्दर तज्रबों का एक आतिशख़ाना है जो एक बाग़ की तरह खिला हुआ है। ख़ामोशी उसका चाक भी है जिस पर वो लफ़्ज़ों की कच्ची मिट्टी से मा'नी की शक्लें बनाता है। अभिषेक ने ये मिट्टी अपनी ज़ात और ज़माने के जिस्म और रूह के तज्रबों को गूँध कर तैयार की है। ये मिट्टी उसकी अपनी है और उससे बनाई जानेवाली सूरतें भी।
—फ़रहत एहसास
अभिषेक एक अनोखे अन्दाज़ में सोचते हैं और अपने इज़हार के लिए नई ज़मीन ढूँढ़ लेते हैं। इसलिए उनकी ज़मीन में, ज़ेहन में, ज़बान-ओ-बयान में और उस्लूब में एक अनोखी ताज़गी का एहसास होता है। उनकी शख़्सियत अवध की मुश्तरका तहज़ीब और एक गहरी इनसान दोस्ती की रिवायत के पसमंज़र पर मबनी है। इसीलिए उनकी शा'इरी और शख़्सियत दोनों में एक कुशादगी का रंग नुमायाँ है। न तो उनके तज्रबे महदूद हैं न उनकी शा'इरी का लहजा न लफ़्ज़ियात। इसीलिए वो कभी ग़ैर दिलचस्प नहीं हुए।
—शमीम हनफ़ी

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