‘हवाओं की दस्तक’ यादों से भरी ऐसी आत्मकथात्मक किताब है जो बदलते समय की दास्तान अपने तरीक़े से सुनाती है। बदलाव की आहट देती हवाओं की दस्तक आपको बरास्ता उदयपुर, दिल्ली, मुम्बई और बिहार ले जाती है, जहाँ समय बदल रहा है, शताब्दी बदल रही है। यह समाजवादी मन वाले परिवार की मोहक दुनिया से जुड़ी वह कथा है जो समाजवादी सपने के टूट जाने की त्रासदी से जुड़ी है। इस यात्रा में लेखक न केवल पत्रकारिता के हिमालय के पिघलते चले जाने का गवाह बनता है बल्कि पूरी हिन्दी पत्रकारिता के ही अप्रासंगिक होने को महसूस करता है, उसे ख़त्म होते देखता है। मुम्बई जैसे शहर के सतरंगे मिज़ाज के बदलने की कथा कहती यह किताब आपके मन को कमजोर नहीं करती, उसे संकल्प और उम्मीद की शक्ति देती है। दुनिया को अलग रंग से उकेरती यह किताब समय का दस्तावेज़ है।

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