यह हिन्दी कहानी का पहला व्यवस्थित इतिहास है और हिन्दी-उर्दू का पहला समेकित इतिहास तो यह है ही। उल्लेखनीय है कि इस अवधि के अनेक कहानीकार एक साथ हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में लिख रहे थे। इनमें प्रेमचन्द प्रमुख हैं। इसके अलावा सुदर्शन, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि भी उर्दू और हिन्दी में साथ-साथ लिख रहे थे। इनकी हिन्दी और उर्दू में भी, लिपि को छोड़कर, कोई विशेष अन्तर नहीं है। कथ्य और संरचना में, भाषिक आधार पर तो, कोई अन्तर है ही नहीं। उर्दू की अधिकतर उल्लेखनीय कहानियाँ हिन्दी में रूपान्तरित या देवनागरी में लिप्यन्तरित भी हो चुकी हैं। ...उर्दू कहानियों पर अधिकतर सामग्री उर्दू साहित्य के इतिहास-ग्रन्थों और आलोचना-पुस्तकों से ली गई है, और यथास्थान उनका सन्दर्भ भी दे दिया गया है। इस किताब में हिन्दी और उर्दू के साथ-साथ भोजपुरी, मैथिली और राजस्थानी के कहानी-साहित्य को भी स्थान दिया गया है। इस पुस्तक में जिस अवधि के कहानी-साहित्य का इतिहास प्रस्तुत किया गया है, उस अवधि में अहिन्दीभाषियों और प्रवासी भारतीयों द्वारा लिखित कहानी-साहित्य का कोई सुनियोजित विवरण उपलब्ध नहीं है। इस कारण उस विशाल, और कदाचित् मूल्यवान, साहित्य को इस ‘इतिहास’ में स्थान देना सम्भव नहीं हो सका है।
इस किताब में उर्दू-हिन्दी और मैथिली-भोजपुरी-राजस्थानी के लगभग 100 कहानी-लेखकों और 3000 कहानियों का कमोबेश विस्तार के साथ विवेचन या उल्लेख किया गया है। कहानी-लेखकों और कहानी-संग्रहों की अक्षरानुक्रम सूची अनुक्रमणिका में दे दी गई है। इसके साथ ही जो कहानियाँ किसी भी कारण चर्चित रही हैं, या उल्लेखनीय हैं, उनकी अक्षरानुसार सूची भी उपलब्ध करा दी गई है। आशा है, इससे पाठकों की जिज्ञासाओं की तुष्टि हो सकेगी।

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