इस पुस्तक में हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत से पूरी तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई है। एक ओर जहाँ 1826 से लेकर लगभग सन् 2000 तक हिंदी की पूरी राजनीतिक पत्रकारिता का विकास दिखाया गया है, वहीं दूसरी ओर 1867 ई. से शुरू होने वाली साहित्यिक पत्रकारिता को भी सम्मिलित किया गया है। पत्रकारिता में रुचि रखने वाले अध्येताओं के लिए इसमें भरपूर सामग्री तो है ही, पत्रकारिता के विद्यार्थियों की ज़रूरत के मुताबिक इसमें पत्रकारिता के व्यावहारिक पहलू पर भी प्रकाश डाला गया है, मसलन समाचार-निर्माण के तहत समाचारों के स्रोत सहित उसके संकलन-लेखन और संपादन की विधि तो बतायी ही गई है, शीर्षक लगाने, आमुख लिखने और कैप्शन लगाने का तरीका भी बताया गया है।<br><br>
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी पत्रकारिता किन प्रतिबंधों से गुजरी है और उस दौर के पत्रकारों ने कैसे उनका मुकाबला किया, इसका हवाला तो दिया ही गया है, पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने वालों को आगाह करने के लिए भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों, मानवाधिकारों और सूचना के अधिकार की भी पूरी जानकारी दी गई है। प्रजातंत्र में चौथे खंभे के रूप में पत्रकारिता की अहमियत के साथ-साथ उसके दायित्व तथा उसको संरक्षण देने वाली प्रमुख संस्थाओं का भी इसमें उल्लेख किया गया है। मशहूर पत्रकारों के जीवन-संघर्षों से तो रूबरू कराया ही गया है, राष्ट्रीय महत्त्व के कुछेक ज्वलंत मुद्दों पर भी रोशनी डाली गयी है।

