बहुपठित युवा व्यंग्यकार के.डी. सिंह की यह किताब दरअसल जीवन की गुज़री राहों से कुछ यादगार टुकड़े समेटती है, जो लेखक के तो हैं ही, इसमें आप और हम भी होंगे। इन्हीं टुकड़ा-टुकड़ा स्मृतियों को सहेजती हुई ये किताब 'जब ज़िन्दगी मुस्कुरा दी' लेखक के चालीस वर्षों के सिंहावलोकन के कुछ पुंज, कुछ अपने, कुछ अपनों के अनुभव...अच्छे-बुरे लोगों के सानिध्य और कच्चे पक्के दुनियावी रास्तों से गुज़रते हुए, जीवन के कुछ अनमोल और न भूलनेवाले चित्रों का संकलन है, जो जीवन की स्मृतियों को सार्वजनिक तौर पर साझा करते हैं। ये संस्मरण हैं, स्मृति चित्र हैं...बीती ज़िन्दगी के, पर जिनकी रोशनी आगे के जीवन-पथ को भी आलोकित करती है...
जाने कितना जीवन,
पीछे छूट गया अनजाने में
अब तो कुछ क़तरे हैं बाक़ी,
साँसों के पैमाने में...
इतना जान लिया तो यारो,
कैसी बन्दिश उनवाँ की
अपना-अपना रंग भरेगा,
हर कोई अफ़साने में....!!

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