‘जहाँ लक्ष्मी कैद है’, ‘छोटे-छोटे ताजमहल’, ‘किनारे से किनारे तक’ में राजेन्द्र यादव की ही नहीं, हिन्दी-कहानी वयस्क हुई है और अनुभव की अधिक गहरी तहों का उद्घाटन करती है।
किनारे से किनारे तक की अन्तर्यात्रा पाठक को ऐसे उदात्त सत्य से साक्षात्कार कराती है, जिसके लिए वह तैयार नहीं है। प्रतीक्षा, पुराने नाले पर नया फ़्लैट, बिरादरी बाहर, भय कहानियाँ जिस गहरे रचनात्मक सरोकार से आईं हैं, वही राजेन्द्र यादव को विशिष्ट बनाता है।
ये कहानियाँ शिल्प, भाषा और अपने बहुआयामी कथ्य के कारण ही बेजोड़ हैं। कथाकार राजेन्द्र यादव की क्षमताओं और प्रभाव को समझने के लिए इन्हें पढ़ना आवश्यक है।
दर्जनों बार उद्धृत, अनुवादित और प्रायः हर कहानी-समीक्षा में चर्चित इन कहानियों को पढ़ना हिन्दी की उन्नत कहानियों से परिचय प्राप्त करना है

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