साहित्य अकादेमी पुरस्कार से पुरस्कृत कथाकार काशीनाथ सिंह की औपन्यासिक कृति ‘काशी का अस्सी’ अपने प्रकाशन के बाद से लगातार हिन्दी के पाठकों को आकर्षित करती रही है। खिलंदड़ और सीधे आम आदमी से ली गई इसकी भाषा, इसके सजीव पात्र और बनारस के मुहल्लों-गलियों को चित्रों की तरह उपस्थति करती हुई यह कृति आज हर पाठक की प्रिय पुस्तकों में शामिल है।
इसी उपन्यास के एक अध्यापन ‘पांड़े कौन कुमति तोहे लागी’ को लेकर प्रसद्धि फिल्म निर्देशक डॉ. चन्द्रप्रकाश द्विवेदी ने ‘मोहल्ला अस्सी’ नाम से एक फ़िल्म बनाई। इस पुस्तक में उसी पुस्तक की पटकथा और ‘काशी का अस्सी’ का सम्बन्धित अध्याय संकलित है। साथ ही डॉ. चन्द्रप्रकाश की एक भूमिका भी जिससे पता चलता है कि किसी साहित्यिक कृति को फिल्म के फॉर्म में ढालने की प्रक्रिया क्या होती है; और उन्होंने इस चुनौती को कैसे हल किया।
एक सांस्कृतिक शहर में बाजारवाद कैसे आता है, और कैसे वह वहाँ के लोगों की सोच-समझ और प्राथमिकताओं को बदलता है, यह फ़िल्म इसी कथ्य को केन्द्र में रखती है।
धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने और कुछ शब्दों के प्रयोग को लेकर यह फिल्म सेंसर बोर्ड में भी काफी समय तक अटकी रही। फिर मामला कोर्ट में पहुँचा। इस सबके चलते 2015 में तैयार हो चुकी फ़िल्म 2018 में दर्शकों तक पहुँची। इस किताब में अदालत का वह फैसला भी शामिल किया गया, जिसके बाद फ़िल्म रिलीज हो सकी।

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