कृष्णमुरारि मिश्र हिन्दी आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उन्हें हिन्दी की आद्यबिम्बात्मक आलोचना के प्रर्वतन का श्रेय प्राप्त है। साहित्यिक रचनाओं की संरचनात्मक व्याख्या और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के लिए वे प्रख्यात हैं।
‘मुक्तिबोध : कविता का आद्यबिम्बत्व’ पुस्तक मुक्तिबोध की कविता की व्याख्या और मूल्यांकन के नए आयाम प्रदान करती है। पुस्तक में बहिस्साक्ष्य और अन्तःसाक्ष्य के आधार पर मुक्तिबोध का विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान से घनिष्ठ परिचय एवं उनके सृजन में विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान की धारणाओं के उपयोग को प्रमाणित किया गया है। नए कवियों में मुक्तिबोध ने ही युंगीय मनोविज्ञान के महत्त्व को सर्वप्रथम और सर्वाधिक अनुभव किया था। साथ ही फ्रायड के सिद्वान्त भी उनके काव्य में प्रगतिवादी विचारधारा के अनुरूप ढलकर प्रयुक्त हुए हैं। मुक्तिबोध की विश्व-दृष्टि प्रगतिवादी थी, उनका प्रगतिवाद विभिन्न दर्शनों और विज्ञानों से पोषित था।
इस पुस्तक में मुक्तिबोध की कविता में अचेतन के आद्यबिम्बों और आत्मोपलब्धि प्रक्रिया के आद्यबिम्बों का अध्ययन किया गया है। इसके साथ ही ‘भाषा का आद्यबिम्बत्व’ शीर्षक निबन्ध में मुक्तिबोध के काव्य की भाषिक संरचना, ‘ब्रह्मराक्षस’ शीर्षक निबन्ध में कविता के ब्रह्मराक्षस की पहचान है। हिन्दी आलोचना के इतिहास में पहली बार लेखक ने पुष्ट प्रमाणों के आधार पर सिद्ध किया है कि ब्रह्मराक्षस जयशंकर प्रसाद को बिम्बित करता है।
आशा है कि यह हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक साबित होगी।

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