‘नेपाल उर्फ़ लट्ठा पार की डायरी’ के केन्द्र में नेपाल और भारत का समाजवादी आन्दोलन है, ख़ासकर 1940 से लेकर 1980 के बीच का समय। वह दौर जब नेपाली जन-गण ने पहले राणाशाही और उसके बाद राजशाही के विरुद्ध निर्णायक संघर्षों के द्वारा लोकतांत्रिक अधिकार हासिल किये।
इस संघर्ष में भारत के समाजवादी नेताओं की उल्लेखनीय और मार्गदर्शक भूमिका रही। रिपोर्ताज के रूप में लिखी गई इस पुस्तक का आरम्भ ही जयप्रकाश नारायण और उनके साथियों द्वारा हज़ारीबाग़ जेल को तोड़कर नेपाल जाने से होता है।
यह पुस्तक बहुत बारीकी से न सिर्फ़ नेपाली जन आन्दोलन के सूक्ष्म ब्योरों को अंकित करती है बल्कि इससे समाजवादी नेताओं की वैश्विक सोच और विश्व-दृष्टि का भी पता चलता है।
एक कार्यकर्ता की दृष्टि से दिखता इस पुस्तक में निबद्ध समय हमें उन प्रश्नों पर भी विचार करने को प्रेरित करता है जो सत्ता और शक्ति-केन्द्रों के स्वार्थी चरित्र से जुड़े हैं। इतिहास जिन्होंने बनाये, यह उनकी दास्तान है। मामूली आदमी के ओज का इतिहास।
सबसे अहम जो चीज़ इस वृत्तान्त में दिखाई देती है वह है भारत और नेपाल के लोगों का एकत्व भाव। गहरे अध्ययन, यात्राओं और भेंट-मुलाक़ातों से प्राप्त ऐतिहासिक तथ्यों को अपने पाठ में बुनते हुए रवीन्द्र भारती यहाँ इतिहास के कई भुला दिये गए अध्यायों को प्रकाशित करते हैं और ज़मीन से जुड़े लोगों को ऊर्जावान बनाते हैं।

Loading, please wait...

