उसका ठाठ-बाट देखकर हॉस्टल की हर लड़की के मन में यह विश्वास जम चुका था कि वह किसी राजा की लड़की है, और आज उसने अचानक बताया कि वह अनाथ है।
आख़िर कौन थी निरंजना!
इलाचन्द्र जोशी का यह प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक उपन्यास ‘पर्दे की रानी’ में इसी निरंजना की कथा है जो हॉस्टल में आते ही हर किसी की जिज्ञासा का केन्द्र बन जाती है। अपने कमरे में पर्दे डालकर रहती है और अपनी हमउम्र लड़कियों की तरह पत्रिकाएँ और रोमांटिक किताबों के बजाय गहन साहित्यिक और दार्शनिक ग्रंथ पढ़ती है, जो मानती है कि दुख ही जीवन है। उपन्यास दो भागों में बँटा हुआ है। पहले भाग में निरंजना को लेकर जो प्रश्न खड़े होते हैं, दूसरे भाग में उनके उत्तर मिलते हैं जहाँ निरंजना की सम्पूर्ण कथा विस्तार से पढ़ने को मिलती है।
मालूम होता है कि वह दरअसल एक वेश्या-पुत्री है और अपनी माँ की तरह उसने भी सामर्थ्य-सम्पन्न पुरुषों से कुछ कम पीड़ा नहीं पाई है। हॉस्टल में सहेली बनी शीला भी आगे चलकर उसकी कहानी का हिस्सा बनती है जो सुशील भारतीय नारी समाज के प्रतिनिधि के तौर पर निरंजना के स्वतंत्रचेता, निडर और आधुनिक व्यक्तित्व को और साफ़ ढंग से उभारती है।
अत्यन्त रोचक और विचारोत्तेजक उपन्यास!

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