केरल के निम्न-मध्यवर्गीय समाज और मुस्लिम आबादी को गझिन पृष्ठभूमि से कथानक लेकर उन्हें जादुई कलात्मकता से कहानियों में प्रस्तुत करनेवाले वाइकम मुहम्मद बशीर भारतीय तथा साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं।
इस्लामिक सामाजिक परिवेश, इस्लाम के पौराणिक मिथकों और केरल के मुस्लिमों में प्रचलित भाषा रूपों का प्रयोग उनके कथा-जगत को एक अलग पहचान देता है। मलयाली ही नहीं, अन्य भाषाओं में भी इस कोटि का बहुत कुछ नहीं मिलता।
इस संग्रह में उनकी पन्द्रह अद्भुत कहानियाँ संकलित हैं जो समाज के हाशिए पर रहनेवाले ग़रीब लेकिन जीवट और मनुष्यता से लवरेज लोगों का चित्रण करती हैं। पहली ही कहानी ‘जुआरी की बेटी’ कथाकार की मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय समझ का एक आकर्षक नमूना है।
बशीर स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय रहे थे। उस दौरान उनके कुछ अनुभव संग्रह में शामिल ‘माँ’, ‘हथकड़ी’ और ‘पुलिसवाले की बेटी’ आदि कहानियों में देखने को मिलते हैं। उनके कथासंसार में सिर्फ़ मनुष्य ही नहीं, बल्कि संसार की सभी चर-अचर वस्तुएँ जैसे चैतन्य होकर गति करती है।

Loading, please wait...
