प्रस्तुत संस्करण की उपयोगिता में बढ़ोतरी हेतु ‘सार्वजनिक अर्थशास्त्र’ को पूर्णतया
परिशोधित किया गया है। आर्थिक सुधारों के वर्तमान दौर में राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में जो
एक नए आर्थिक परिवेश का निर्माण हो रहा है, उनको ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक अर्थशास्त्र के
सिद्धान्तों एवं विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक आधार पर किया गया है। साथ
ही पुस्तक को अधिकाधिक उपयोगी बनाने हेतु यह प्रयास किया गया है कि भारतीय लोक वित्त के अति
जटिल किन्तु महत्त्वपूर्ण आयामों का विश्लेषणात्मक अध्ययन अति रुचिकर होने के साथ-साथ सभी
पाठकवर्गों के लिए तर्काधार विचार संरचना करने में सहायक हो। आशा है, यह संस्करण पाठकों को सर्वथा
नवीनता लिए हुए प्रतीत होगा एवं वे वर्तमान संस्करण को पहले से कहीं अधिक अद्यतन, व्यापक, उपयोगी
और रोचक पाएँगे।

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