मन्नू भंडारी की प्रसिद्ध कहानी ‘यही सच है’ और उस पर आधारित बासु चटर्जी की फ़िल्म ‘रजनीगंधा’। इन दोनों रचनाओं ने अपने-अपने क्षेत्र में इतिहास रचा था। ‘यही सच है’ अपनी जटिल भावभूमि और सघन संवेदना के चलते जहाँ हिन्दी की उत्कृष्ट कहानियों में शुमार हुई और बड़े पैमाने पर प्रशंसित-चर्चित होती हुई आज भी अपनी प्रासंगिकता में अडिग है, वहीं ‘रजनीगंधा’ फ़िल्म ने हिन्दी सिनेमा के कलात्मक और कॉमर्शियल विभाजन को शायद पहली बार ख़त्म किया और एक अत्यन्त संवेदनशील विषय को बेहद बारीकी से फ़िल्माते हुए लोकप्रियता के मानदंड स्थापित किए।
उल्लेखनीय है कि ‘रजनीगंधा’ शायद अकेली ऐसी फ़िल्म है जिसे फ़िल्मफेयर के ‘पब्लिक’ और ‘क्रिटीक’, दोनों अवार्ड मिले।
‘रजनीगंधा’ की यह पटकथा सिनेप्रेमियों को एक बार पुन: अपनी स्मृतियों में बसी उस फ़िल्म के साथ होने का अहसास देगी और फ़िल्म में देखे अपने प्रिय पात्रों-दृश्यों को भाषा के टकराव में ज़्यादा निकट से देखने और समझने का अवसर उपलब्ध कराएगी।

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