साहित्य समाज को बहुत दूर तक प्रभावित करने की क्षमता रखता है, बशर्ते उसमें वह सामर्थ्य हो। वह जन-मन की इतनी निकटता पा सके, समाज से इतना अपनापा बना सके, समाज से इतना अपनापन प्राप्त कर सके कि समाज उस पर विश्वास करे, उसे अपने जीवन में ढाल ले, अपना जीवन-दर्शन बना ले।
देश-व्यापी प्रसार के लिए किसी साहित्य का देश-व्यापी भाषा में आना आवश्यक होता है, भले ही मूलतः वह किसी भी भाषा में लिखा-रचा गया हो। वर्तमान में हिन्दी ही भारत की वह देश-व्यापी भाषा है जो पूरे देश को साहित्य के माध्यम से सांस्कृतिक एवं भावनात्मक धरातल पर जोड़ सकती है। यह कार्य वह यथाशक्य कर भी रही है। पूर्वोत्तर का साहित्य और लोक-साहित्य भी धीरे-धीरे करके हिन्दी में आ रहा है। आज इस क्षेत्र में हिन्दी में मौलिक लेखन भी हो रहा है और यहाँ का नया-पुराना साहित्य अनूदित रूप में भी हमारे सामने आ रहा है। उसका नोटिस बाहर भी लिया जा रहा है और उस पर हिन्दी में शोध-समीक्षात्मक तथा तुलनात्मक लेखन-अध्ययन पूर्वोत्तर में भी चल रहा है। हमारी राष्ट्रीय अस्मिता को रेखांकित कराने का यह एक प्रभावी उपक्रम है। परन्तु यह प्रयास अभी नाकाफी है। इस कार्य को गति देने की आवश्यकता है। ‘राष्ट्रीय अस्मिता और पूर्वोत्तर का साहित्य’ पुस्तक का लेखन इसी दिशा में एक छोटा-सा प्रयास है।

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