बांग्लादेश के आठवें संसदीय चुनाव के दौरान और उसके तुरन्त बाद वहाँ के हिन्दू समुदाय पर अत्याचार-उत्पीड़न का जो दौर चला, सलाम आज़ाद की यह औपन्यासिक कृति उसी का दस्तावेज़ है। बांग्लादेश बनने के बाद वहाँ के हिन्दू कई बार अत्याचार के शिकार हुए हैं लेकिन इस बार सुनियोजित ढंग से उन पर अत्याचार-उत्पीड़न का जो चक्र चला, उसके आगे पिछली घटनाएँ नगण्य हैं। बांग्लादेश से हिन्दुओं को नेस्तनाबूद कर वहाँ उग्र इस्लामी तथा तालिबानी राजसत्ता क़ायम करने के मक़सद से इस्लामी कट्टरपंथियों की मदद से बने चार दलीय गठबन्धन की छत्रच्छाया में हिन्दू नागरिकों पर चौतरफ़ा अत्याचार किया गया। पिता के सामने बेटी के साथ और माँ-बेटी को पास-पास रखकर बलात्कार किया गया। बलात्कारियों की पाशविकता से सात साल की बच्ची से लेकर साठ साल की वृद्धा तक को रिहाई नहीं मिली। लेकिन क्यों और कहाँ से आई यह बर्बरता? एक समुदाय के ख़िलाफ़ क्यों चला यह अत्याचार का दौर?—इसी का जवाब ढूँढ़ा गया है इस उपन्यास में।

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