राम भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का एक अभिन्न अंग हैं। रामकथा भी। उन्हें जानने के लिए हमें अलग से कुछ पढ़ने की जरूरत नहीं होती। राम हमें हमारे पर्यावरण से निरायास मिल जाते हैं। राम-नाम भारतीय मानस के व्यवहार का एक सकर्मक हिस्सा हैं।
‘सब पर राम तपस्वी राजा’ रामकथा की कुछ निर्णायक और बोधक घटनाओं को पुनः व्याख्यायित करनेवाली कविताओं का संग्रह है। राम वनवास, सीता का हरण, लंका में युद्ध आदि प्रकरणों से सभी परिचित हैं लेकिन ये कविताएँ उन्हें अपनी एक विशिष्ट शैली और रचनात्मकता के साथ प्रस्तुत करती हैं।
राम-चेतना में अटूट आस्था रखनेवाले कवि आशुतोष अग्निहोत्री अपनी अब तक की रचना-यात्रा में बहुधा राम की ओर लौटते रहे हैं। इस पुस्तक में उन्होंने अपने उसी राम-भाव का और गहराई के साथ अवगाहन किया है।
छन्द और लय पर उनकी असाधारण पकड़ है जिसके चलते ये कविताएँ सन्दर्भित घटनाओं और रामकथा के पात्रों को कई आयामों से आलोकित करती चलती हैं। संवादों के साथ पात्रों का आंतरिक भावात्मक परिप्रेक्ष्य भी इनमें अपने सम्पूर्ण विस्तार के साथ पाठक के समक्ष उपस्थित हो जाता है।
कवि का मानना है कि राम सिर्फ दशरथ पुत्र ही नहीं, निराकार ब्रह्म भी हैं जिनकी महिमा का बखान कविगण सदैव ही अपने-अपने ढंग से करते रहे हैं। उसी सुदीर्घ और व्यापक शृंखला की एक कड़ी यह भी है। पाठक निश्चय ही इसे अपना-सा पाएँगे।

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